हरिद्वार। उत्तराखंड के जनजातीय क्षेत्रों में औषधीय वनस्पतियों को लेकर पतंजलि योगपीठ के शोध ने नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं। अब तक राज्य में करीब 1300 औषधीय पौधों का सरकारी रिकॉर्ड मौजूद था, लेकिन पतंजलि की वैज्ञानिक टीम ने केवल चार जनजातीय जिलों के अध्ययन में ही 1011 औषधीय पौधों की पहचान कर सभी को चौंका दिया है। अब पतंजलि की टीम पूरे उत्तराखंड के 13 जिलों में औषधीय पौधों की खोज और वैज्ञानिक अध्ययन में जुटी हुई है, जिसके प्रारंभिक परिणाम बेहद उत्साहजनक बताए जा रहे हैं।
आयुर्वेद शिरोमणि आचार्य बालकृष्ण के निर्देशन में देहरादून, चमोली, पिथौरागढ़ और उधमसिंह नगर के जनजातीय क्षेत्रों में व्यापक सर्वेक्षण अभियान चलाया गया। शोधकर्ताओं की टीम 122 गांवों और 14 तहसीलों तक पहुंची, जहां पीढ़ियों से पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान को संजोए जनजातीय वैद्यों से संवाद किया गया। अध्ययन के दौरान 216 जनजातीय वैद्यों की पहचान की गई, जिनके पास विभिन्न बीमारियों के उपचार की अनूठी पारंपरिक विधियां मौजूद हैं।
शोध के दौरान 238 ऐसे औषधीय पौधों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण किया गया, जिनकी जानकारी अब तक आम दुनिया से लगभग अंजान थी। इस अध्ययन को ‘डॉक्यूमेंट ऑफ ट्राइबल हिल्स’ के रूप में संकलित किया जा रहा है, जिससे मौखिक परंपराओं में सुरक्षित यह ज्ञान अब वैज्ञानिक और लिखित स्वरूप में संरक्षित हो सकेगा।
प्रमुख जनजातियों की सहभागिता
इस अध्ययन में उत्तराखंड की प्रमुख जनजातियों की सक्रिय भागीदारी सामने आई है। इनमें जौनसारी समुदाय की हिस्सेदारी 39 प्रतिशत, भोटिया 36 प्रतिशत, थारू 10 प्रतिशत, बुक्सा 9 प्रतिशत और वन राजी समुदाय की 6 प्रतिशत भागीदारी दर्ज की गई।
हर बीमारी का पारंपरिक उपचार
अध्ययन के दौरान यह भी सामने आया कि जनजातीय समुदाय पेट दर्द, सर्दी-जुकाम, बुखार, मधुमेह, डायरिया, अस्थमा, पाइल्स, किडनी स्टोन, दांत दर्द, हड्डी जोड़ने, जोड़ों के दर्द और अर्थराइटिस जैसी अनेक बीमारियों का उपचार पारंपरिक जड़ी-बूटियों से करते हैं। विशेष रूप से जोड़ों के दर्द और अर्थराइटिस के उपचार में इन समुदायों की विशेषज्ञता उल्लेखनीय पाई गई।
पहली बार हुई जनजातीय परिवारों की जियो टैगिंग
पतंजलि की टीम ने इस अभियान के दौरान जनजातीय परिवारों की जियो टैगिंग कर एक नया रिकॉर्ड भी बनाया। घुमंतू प्रवृत्ति के कारण इन समुदायों तक पहुंचना बेहद चुनौतीपूर्ण रहा, लेकिन टीम ने करीब 28 हजार जनजातीय परिवारों की पहचान कर उनका डाटा संकलित किया। इससे पहले सरकारी स्तर पर करीब 50 हजार परिवारों का अनुमान लगाया जाता रहा था।
पतंजलि ने इन जनजातीय समुदायों को कृषि, व्यवसाय और स्वरोजगार से जोड़ने के प्रयास भी शुरू किए हैं। ‘अन्नदाता एप’ के माध्यम से जनजातीय समुदाय अब बिना बिचौलियों के अपने उत्पाद सीधे बाजार तक पहुंचा पा रहे हैं।
आचार्य बालकृष्ण ने क्या कहा
आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि जनजातीय समाज के पास प्रकृति और औषधीय वनस्पतियों का जो पारंपरिक ज्ञान है, वह मानवता की अमूल्य धरोहर है। पतंजलि इस विलुप्त होती विरासत को वैज्ञानिक रूप से संरक्षित करने का कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि 13 जिलों में जारी सर्वेक्षण के बाद उत्तराखंड की औषधीय वनस्पतियों की एक नई तस्वीर सामने आ सकती है।
फोटो कैप्शन:
1. आचार्य बालकृष्ण टीम के साथ जनजातीय क्षेत्रों में औषधीय पौधों की खोज करते हुए।
2. आचार्य बालकृष्ण जनजातीय क्षेत्रों में औष
धीय पौधों का अध्ययन करते हुए।




