शहर के कई निजी स्कूलों में बढ़ती फीस, महंगी किताबों और नोटबुकों की अनिवार्यता को लेकर अभिभावकों में गहरा आक्रोश देखा जा रहा है। अभिभावकों का आरोप है कि 20 रुपये की सामान्य नोटबुक पर स्कूल का नाम छापकर उसे 100 रुपये तक में बेचा जा रहा है। इतना ही नहीं, एनसीआरटी की किताबों के अलावा स्कूल अपने नाम से अतिरिक्त पुस्तकें अनिवार्य कर रहे हैं, जिन्हें केवल निर्धारित दुकानों से ही खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है।
अभिभावकों का कहना है कि हर वर्ष “एनुअल चार्ज” के नाम पर भारी रकम वसूली जाती है, जबकि उसकी पारदर्शिता स्पष्ट नहीं होती। ड्रेस और किताबों के लिए भी स्कूलों द्वारा तय की गई दुकानों से ही खरीदारी करने का दबाव बनाया जाता है। इससे प्रतिस्पर्धा समाप्त हो जाती है और कीमतें मनमाने ढंग से बढ़ा दी जाती हैं। मध्यम वर्गीय और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए बच्चों की शिक्षा का खर्च लगातार बोझ बनता जा रहा है।
स्थानीय अभिभावकों ने आरोप लगाया कि फीस वृद्धि पर कोई ठोस नियंत्रण नजर नहीं आता और न ही संबंधित अधिकारियों द्वारा नियमित जांच की जा रही है। शिकायतों के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर कोई सख्त कार्रवाई सामने नहीं आई है। अभिभावकों का यह भी कहना है कि यदि समय रहते इस पर अंकुश नहीं लगाया गया तो शिक्षा का अधिकार केवल आर्थिक रूप से सक्षम लोगों तक सीमित होकर रह जाएगा।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा सेवा है, व्यवसाय नहीं। पारदर्शिता, जवाबदेही और नियमन सुनिश्चित करना शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी है। अभिभावकों ने मांग की है कि स्कूलों की फीस संरचना, किताबों की अनिवार्यता और एनुअल चार्ज की स्वतंत्र जांच कराई जाए तथा मनमानी वसूली पर तत्काल रोक लगाई जाए, ताकि शिक्षा व्यवस्था में विश्वास और संतुलन कायम रह सके।




