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जमीन कहीं नहीं, कहीं भवन अधूरे: उत्तराखंड में केंद्रीय विद्यालयों का सपना अटका

उत्तराखंड में केंद्रीय विद्यालयों के विस्तार की योजना भूमि और भवन संबंधी समस्याओं के कारण अटकती नजर आ रही है। कई स्थानों पर विद्यालयों के लिए भूमि हस्तांतरित नहीं हो पाई है, जबकि कुछ जगहों पर भवन निर्माण कार्य वर्षों से अधूरा पड़ा है। इसका खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ रहा है, जिन्हें अपने ही क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है।

राज्य के विभिन्न जिलों में स्वीकृत केंद्रीय विद्यालय या तो अस्थायी भवनों में संचालित हो रहे हैं या फिर भवन निर्माण और भूमि उपलब्धता की बाधाओं से जूझ रहे हैं। इससे विद्यालयों में प्रवेश क्षमता सीमित बनी हुई है और हजारों छात्र केंद्रीय विद्यालय की सुविधाओं से वंचित हैं।

शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि केंद्रीय विद्यालय बेहतर शैक्षणिक गुणवत्ता, आधुनिक संसाधनों और राष्ट्रीय स्तर के पाठ्यक्रम के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में विद्यालयों के निर्माण और संचालन में हो रही देरी का सीधा असर विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ रहा है।

वहीं, कुछ स्थानों पर भवन निर्माण कार्य अंतिम चरण में पहुंचने के बावजूद अभी तक छात्रों को उसका लाभ नहीं मिल पाया है। अभिभावकों और स्थानीय लोगों ने सरकार से लंबित परियोजनाओं को शीघ्र पूरा कर केंद्रीय विद्यालयों का नियमित संचालन शुरू कराने की मांग की है।

मुख्य बिंदु

कई जिलों में केंद्रीय विद्यालय भूमि और भवन संबंधी समस्याओं से प्रभावित।

अस्थायी भवनों में संचालित हो रहे हैं कई विद्यालय।

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए छात्रों और अभिभावकों की बढ़ी चिंता।

लंबित निर्माण कार्य और भूमि हस्तांतरण में तेजी लाने की मांग।

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