मां गंगा के तट स्थित मां मनसा देवी की चरण पादुका स्थल पर कांवड़ मेले के सकुशल एवं निर्विघ्न समापन की कामना को लेकर विशेष पूजा-अर्चना और संत सम्मेलन आयोजित किया गया। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत डॉ. रविंद्र पुरी महाराज के नेतृत्व में हुए सम्मेलन में देशभर से पहुंचे संत-महात्माओं ने सनातन संस्कृति की एकता, संरक्षण और संस्कारों को मजबूत करने पर विचार रखे।
सम्मेलन में पंजाब के सूफी संत शमशेर सिंह लहरी की सूफी गायन एवं भजनों की प्रस्तुति विशेष आकर्षण का केंद्र रही। उनके भजनों ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। प्रस्तुति के बाद संत समाज की ओर से उनका माल्यार्पण कर और मां की चुनरी ओढ़ाकर सम्मान किया गया।
श्रीमहंत डॉ. रविंद्र पुरी महाराज ने कहा कि सनातन भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का आधार है। उन्होंने कहा कि समाज को आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर संस्कृति, संत परंपरा और धार्मिक मूल्यों के संरक्षण के लिए एकजुट होना चाहिए। उन्होंने संत समाज से आने वाली पीढ़ियों तक सनातन संस्कार पहुंचाने का आह्वान किया।
श्रीमहंत राम रतन गिरि ने कहा कि सनातन संस्कृति मानवता को जोड़ने का संदेश देती है। महामंडलेश्वर स्वामी संतोषानंद ने परिवार, गुरु, माता-पिता, गौ, गंगा और संत परंपरा के प्रति श्रद्धा जैसे संस्कार नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता बताई।
स्वामी आनंद स्वरूप ने कहा कि सनातन संस्कृति सत्य, करुणा, सेवा और मानव कल्याण की भावना पर आधारित है। वहीं स्वामी ललितानंद गिरि ने कहा कि सनातन संस्कृति केवल मंदिरों और धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के आचरण, परिवार, संस्कार और सेवा भावना में भी दिखाई देती है।
सूफी संत शमशेर सिंह लहरी ने कहा कि भारत की आध्यात्मिक परंपरा प्रेम, भक्ति और मानवता को जोड़ने वाली रही है। सम्मेलन के अंत में संतों ने मां गंगा और मां मनसा देवी से कांवड़ मेले के निर्विघ्न एवं सकुशल संपन्न होने की प्रार्थना की।चाहें तो इसे मैं अमर उजाला/दैनिक जागरण की शैली में और ज्यादा धारदार, 300–350 शब्दों की फ्रंट/सिटी पेज खबर के रूप में भी तैयार कर सकता हूं।




