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स्वयं को पहचानिए, दुनिया को आपकी मौलिकता चाहिए: अष्टानंद पाठक

वर्तमान समय में लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अवसरों की कमी नहीं, बल्कि स्वयं की पहचान करना है। यह विचार आईआरएएस अधिकारी, लेखक एवं मोटिवेशनल स्पीकर अष्टानंद पाठक ने अपने व्यक्तित्व विकास संबंधी लेख में व्यक्त किए हैं।

उन्होंने कहा कि मनोविज्ञान के ‘व्यक्तिगत भिन्नता’ सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रतिभा, सोच, रुचि और उद्देश्य के कारण अद्वितीय होता है। ऐसे में किसी दूसरे की नकल कर सफलता पाने का प्रयास व्यक्ति को वास्तविक संतोष से दूर कर देता है।

लेख में बताया गया है कि समाज और परिवार के दबाव में कई लोग ऐसे कार्यक्षेत्र चुन लेते हैं जो उनकी प्राकृतिक प्रतिभा और स्वभाव के अनुकूल नहीं होते। यही कारण है कि अनेक लोग सफलता मिलने के बावजूद अपने कार्य से संतुष्ट नहीं रह पाते और तनाव व मानसिक थकान का सामना करते हैं।

अष्टानंद पाठक ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ, सचिन तेंदुलकर, अमिताभ बच्चन या लता मंगेशकर ने अपनी स्वाभाविक प्रतिभा के अनुरूप कार्य न चुना होता, तो दुनिया कई महान उपलब्धियों से वंचित रह जाती।

उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक “श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः…” का उल्लेख करते हुए कहा कि व्यक्ति को अपने स्वभाव के अनुरूप कार्य करना चाहिए, क्योंकि वही उसे वास्तविक संतोष और सफलता प्रदान करता है।

लेख में लोगों से आत्ममंथन करते हुए अपनी वास्तविक क्षमता और रुचियों को पहचानने का आह्वान किया गया है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी जीवन-यात्रा का नायक है और उसे अपनी मौलिक पहचान के साथ आगे बढ़ना चाहिए। दुनिया को किसी की नकल नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति की विशिष्टता और मौलिकता की आवश्यकता है।

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