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हाई-टेक मंच, 3D स्क्रीनें, एसी पंडाल फिर भी कुर्सियां खाली तो क्या हजारों करोड़ यूं ही पानी में बहा दिया

कवि मंच पर कवि महोदय शेर सुना रहे थे, मगर तालियाँ बजाने वाला कोई नहीं

हरिद्वार।

उत्तराखंड राज्य की स्थापना के 25 वर्ष पूरे होने पर धामी सरकार ने सोचा — अब कुछ “भव्य” हो जाए!

बस फिर क्या था, ‘देवभूमि रजत उत्सव’ के नाम पर पूरे राज्य को सजाने-संवारने की जिम्मेदारी ठेकेदारों के हवाले कर दी गई।

हाई-टेक मंच, 3D स्क्रीनें, एसी पंडाल, कवि सम्मेलन… सब कुछ इतना भव्य कि अगर दर्शक होते, तो शायद तालियाँ भी बजतीं।

लेकिन अफसोस — जनता ने तय कर लिया कि “घर पर बैठकर सोशल मीडिया पर ही उत्सव देखेंगे।”

खाली कुर्सियाँ, सन्नाटा और ठेके की सफलता

 

कार्यक्रम स्थल पर कुर्सियाँ तो सजी थीं जैसे किसी बारात में दूल्हे का इंतज़ार हो — लेकिन दूल्हा ही न आया।

कवि मंच पर कवि महोदय शेर सुना रहे थे, मगर तालियाँ बजाने वाला कोई नहीं।

स्टॉलों पर जड़ी-बूटी, हस्तशिल्प और पारंपरिक व्यंजन धूल खा रहे थे — मानो खुद भी सोच रहे हों, “हम भी तो ठेके में ही आए थे।”

 

एक महिला उद्यमी ने व्यंग्य में कहा —

“तीन दिन से बैठे हैं, अब तो ग्राहक नहीं, मक्खियाँ भी आने से हिचक रही हैं।”

1000 करोड़ का प्रचार

 

और अब आती है कहानी की ‘ट्विस्ट’ लाइन — RTI से खुलासा हुआ कि इस उत्सव के प्रचार पर लगभग 1000 करोड़ रुपये खर्च हुए।

जी हाँ, आपने सही पढ़ा — एक हज़ार करोड़!

इतने पैसों में तो छोटे राज्य पूरे साल का विकास प्लान बना लेते हैं, लेकिन यहाँ तो “पोस्टर प्लान” ही हिट रहा।

 

टीवी, अखबार, डिजिटल पोर्टल, रेडियो, और शायद आसमान में बादलों पर भी विज्ञापन दिए गए होंगे — लेकिन जनता तक बात पहुँची नहीं।

लगता है प्रचार विभाग ने “जनता से संवाद” की जगह “मीडिया से अनुबंध” को ज्यादा अहमियत दी।

—निमंत्रण दे सकते हैं, जबरदस्ती नहीं’

 

जब जनता न आई तो आयोजकों ने अपना बचाव भी क्लासिक अंदाज में किया।

व्यवस्था देखने वाले नीरज भटनागर बोले —

“हम निमंत्रण दे सकते हैं, जबरदस्ती पकड़ कर थोड़े ही ला सकते हैं। ठेकेदारों ने अपना काम बेहतरीन किया।”

 

वाह! जनता गायब, लेकिन ठेकेदार सफल — अब इसे ही कहते हैं ‘लोकतांत्रिक आयोजन की नई परिभाषा’!

लोग कह रहे हैं, “अगर ठेकेदारों की तिजोरी भरी है, तो सरकार के लिए यही सच्ची सफलता है।”

जनता का सवाल — यह रजत उत्सव था या रजत खर्चा?

उत्तराखंड में बेरोजगारी, पलायन और महंगाई चरम पर हैं, और ऐसे में 1000 करोड़ रुपये केवल “जश्न” पर उड़ाना जनता के गले नहीं उतर रहा।

लोग सोशल मीडिया पर पूछ रहे हैं —

“क्या यह विकास का उत्सव था या ठेकेदारों के बोनस का पर्व?”

सवाल यह भी है कि क्या सरकार ने ‘देवभूमि’ की आत्मा को सुना या सिर्फ़ बजट का हिसाब?

 

उत्सव नहीं, आईना था यह

‘देवभूमि रजत उत्सव’ का नाम भले चमकदार था, पर नतीजा फीका निकला।

प्रचार के चमकते बैनर और मंचों की रोशनी में जनता की आवाज़ कहीं खो गई।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है —

 

> “प्रतिष्ठा प्रचार से नहीं, विश्वास से बनती है। यह रजत उत्सव, रजत तमाशा साबित हुआ।”

 

 

 

और फिलहाल, हरिद्वार की खाली कुर्सियाँ इस तमाशे की गवाही दे रही हैं — ‘1000 करोड़ में भी तालियाँ नहीं खरीदी जा सकीं।’

 

 

 

 

 

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