सचिन तिवारी की कलम से,
ऋषिकेश/देहरादून। उत्तराखंड में बुनियादी ढांचे और सड़कों के जाल को मजबूत करने के दावों के बीच एक बार फिर पर्यावरण और विकास का टकराव खुलकर सामने आ गया है। भानियावाला-ऋषिकेश हाईवे को फोर-लेन में तब्दील करने के लिए हजारों हरे-भरे पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाने की तैयारी पूरी हो चुकी है। स्थानीय निवासियों और पर्यावरणविदों ने सरकार के इस कदम की तीखी आलोचना करते हुए इसे **”विकास के नाम पर लिखी जा रही विनाश की गाथा”** करार दिया है।
### कंक्रीट के जंगल के लिए उजड़ रहा असली जंगल
लगभग 743 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले इस 20 किलोमीटर लंबे फोर-लेन हाईवे के लिए 4,000 से अधिक पेड़ों को काटने की योजना है। इनमें दशकों पुराने जामुन, सागौन (Teak), और अमलतास जैसे छायादार और फलदार वृक्ष शामिल हैं।
जौलीग्रांट एयरपोर्ट और ऋषिकेश को जोड़ने वाले इस मार्ग को चौड़ा करने के पीछे सरकार का तर्क है कि इससे चारधाम यात्रियों को सुविधा होगी, जाम से मुक्ति मिलेगी और देहरादून से ऋषिकेश का सफर मात्र 30 मिनट में पूरा हो सकेगा। लेकिन पर्यावरण कार्यकर्ताओं का सवाल है कि **”क्या 15-20 मिनट की बचत के लिए प्रकृति की इतनी बड़ी बलि दी जानी चाहिए?”**
### शिवालिक एलीफेंट रिजर्व पर संकट: वन्यजीवों का उजड़ेगा आशियाना
सबसे डराने वाली बात यह है कि यह पूरा क्षेत्र **’शिवालिक एलीफेंट रिजर्व’** के अंतर्गत आता है। यह जंगल हाथियों, बाघों और तेंदुओं का मुख्य कॉरिडोर (आवागमन मार्ग) है।
**पर्यावरणविदों की चेतावनी:**
“हजारों पेड़ों के कटने से वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास तबाह हो जाएगा। जब हाथियों और अन्य जानवरों के सिर से छत छिन जाएगी, तो वे मजबूरी में रिहायशी इलाकों का रुख करेंगे। इससे आने वाले दिनों में मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Animal Conflict) की घटनाएं खतरनाक स्तर तक बढ़ सकती हैं।”
इसके अलावा, आरटीआई (RTI) और सरकारी दस्तावेजों के हवाले से प्रदर्शनकारियों ने दावा किया है कि इस सड़क को चौड़ा करने के पीछे एक बड़ा तर्क ‘वीआईपी मूवमेंट’ (VIP Movement) को सुगम बनाना भी है, जिसे लेकर आम जनता में भारी आक्रोश है।
कागजी दावे: ट्री-ट्रांसप्लांटेशन पर उठे सवाल
बढ़ते विरोध को देखते हुए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने आश्वासन दिया है कि वे करीब 754 वयस्क पेड़ों को काटने के बजाय उन्हें वैज्ञानिक पद्धति से दूसरी जगह ‘ट्रांसप्लांट’ (प्रतिरोपित) करेंगे। साथ ही वन्यजीवों के लिए एलीफेंट अंडरपास और एलिवेटेड रोड बनाने की बात भी कही जा रही है।
हालांकि, स्थानीय एक्टिविस्ट इन दावों को पूरी तरह खारिज कर रहे हैं। उनका कहना है कि देहरादून और ऋषिकेश में पूर्व में किए गए ट्री-ट्रांसप्लांटेशन के प्रयोग पूरी तरह फ्लॉप रहे हैं। उखाड़े गए पेड़ों में से बमुश्किल 5 से 10 फीसदी पेड़ ही दोबारा जीवित रह पाते हैं।
जनता की पुकार: ‘ग्लोबल वार्मिंग के दौर में ये आत्महत्या जैसा’
एक तरफ जहां पूरा देश भीषण गर्मी, जल संकट और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) की मार झेल रहा है, वहीं दूसरी तरफ उत्तराखंड के फेफड़े कहे जाने वाले इन जंगलों को बेरहमी से साफ किया जा रहा है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन ऐसा विकास किस काम का जो आने वाली पीढ़ियों से उनका पानी, शुद्ध हवा और पर्यावरण ही छीन ले।
सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक इस परियोजना के खिलाफ ‘चिपको आंदोलन’ की तर्ज पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो चुके हैं। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार जनभावनाओं और पर्यावरण की पुकार सुनकर इस विनाशकारी योजना के विकल्प (Alternative Route या कम चौड़ाई) पर विचार करती है, या फिर विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति की इस गाथा का अंत कंक्रीट की सड़क के नीचे दफन होकर होगा।




