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नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट, सरकारी स्कूल व्यवस्था हुई धड़ाम, हजारों हुए बंद तो हजारों में शौचालय तक नहीं

भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था इस समय एक अभूतपूर्व और चिंताजनक ऐतिहासिक मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है। आजादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि देश के अधिकांश बच्चे सरकारी स्कूलों के बजाय निजी (प्राइवेट) स्कूलों की दहलीज पर शिक्षा पा रहे हैं। नीति आयोग द्वारा जारी की गई ताज़ा और विस्तृत रिपोर्ट **’स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया: टेम्पोरल एनालिसिस एंड पॉलिसी रोडमैप फॉर क्वालिटी एन्हांसमेंट’** में देश के शिक्षा ढांचे को लेकर कई चौंकाने वाले और कड़वे खुलासे किए गए हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, जहां साल 2005 में देश के 71% छात्र सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे, वहीं अब यह संख्या भारी गिरावट के साथ **49.24%** पर सिमट गई है। यानी अब देश के आधे से अधिक (50.76%) छात्र शिक्षा के लिए निजी क्षेत्र पर निर्भर हैं। यह आँकड़ा सीधे तौर पर सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था पर आम जनता के डगमगाते भरोसे की गवाही दे रहा है।

### **क्यों टूट रहा है भरोसा? मजबूरी में भी महंगे विकल्प चुन रहे अभिभावक**

नीति आयोग की रिपोर्ट से यह साफ है कि शिक्षा व्यवस्था में एक बहुत बड़ा ‘परसेप्शन गैप’ यानी धारणा का अंतर आ चुका है। जो परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हैं और बेहद मुश्किल से निजी स्कूलों की फीस जुटा पाते हैं, वे भी अब कर्ज लेकर या पेट काटकर अपने बच्चों को सरकारी के बजाय प्राइवेट स्कूलों में भेज रहे हैं। इसके पीछे मुख्य वजह निजी स्कूलों में मिलने वाली बेहतर अनुशासनात्मक व्यवस्था, आधुनिक तकनीक से जुड़ाव, अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई और भविष्य में रोजगार के बेहतर अवसरों को माना जा रहा है।

### **बुनियादी ढांचे की बदहाली: न बिजली, न शौचालय**

दशकों से देश में बुनियादी ढांचा मजबूत करने के सरकारी दावों के बीच यह रिपोर्ट कड़वी हकीकत बयां करती है। रिपोर्ट के अनुसार:

* देशभर के करीब **98,000 सरकारी स्कूलों में आज भी लड़कियों के लिए क्रियाशील शौचालय नहीं हैं**।

* **1 लाख से अधिक सरकारी स्कूलों में बिजली की बुनियादी सुविधा तक उपलब्ध नहीं है**।

* लगभग **1.19 लाख स्कूलों में बिजली कनेक्शन काम नहीं कर रहा है** और 50% सरकारी माध्यमिक स्कूलों में **विज्ञान की प्रयोगशालाएं (Science Labs)** तक नहीं हैं।

### **सीखने का गिरता स्तर: 5वीं के छात्र नहीं पढ़ पा रहे 2 री की किताब**

रिपोर्ट केवल इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता में आ रही गिरावट की ओर भी ध्यान खींचती है। प्राथमिक नामांकन (Elementary Enrolment) में तो वृद्धि हुई है, लेकिन ‘लर्निंग आउटकम’ (सीखने के परिणाम) बेहद निराशाजनक हैं। आज भी कक्षा 5 के बड़ी संख्या में छात्र कक्षा 2 के स्तर का पाठ पढ़ने और गणित के सामान्य सवालों (जैसे साधारण भाग देना) को हल करने में पूरी तरह असमर्थ महसूस करते हैं। PARAKH 2024 के डेटा के अनुसार, बच्चे रटने वाली पद्धति में तो ठीक कर रहे हैं, लेकिन जब बात वास्तविक दुनिया या तार्किक सवालों की आती है (जैसे कक्षा 6 के छात्रों के लिए भिन्न/Fractions को समझना), तो 30% से भी कम बच्चे इसमें सफल हो पाते हैं।

### **शिक्षकों की भारी कमी और स्कूलों का विलय (Merger)**

संसाधनों और छात्रों की कमी का सीधा असर स्कूलों के अस्तित्व पर पड़ा है। पिछले एक दशक में देशभर के करीब **93,000 सरकारी स्कूलों को या तो पूरी तरह बंद कर दिया गया या फिर उनका दूसरे स्कूलों में विलय (Merge)** कर दिया गया। इस स्कूल रेशनलाइजेशन की वजह से ग्रामीण इलाकों के बच्चों, विशेषकर लड़कियों के लिए, स्कूल की भौगोलिक दूरी काफी बढ़ गई है, जिससे ड्रॉपआउट रेट (पढ़ाई बीच में छोड़ना) में इजाफा हो रहा है। आलम यह है कि देश में 40% बच्चे हायर सेकेंडरी (12वीं) तक पहुंचने से पहले ही पढ़ाई छोड़ देते हैं और इस स्तर पर सकल नामांकन अनुपात (GER) मात्र 58.4% रह गया है।

### **उत्तर प्रदेश की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक**

नीति आयोग ने देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के आंकड़ों को विशेष रूप से रेखांकित किया है:

* उत्तर प्रदेश में **9,508 सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जो महज ‘एक शिक्षक’ (Single Teacher) के भरोसे** भगवान भरोसे चल रहे हैं। एक ही शिक्षक पर प्रशासनिक कार्य और सभी विषयों को पढ़ाने का बोझ होने से पूरी शिक्षा व्यवस्था चरमरा गई है।

* राज्य में पिछले एक दशक के भीतर लगभग **25,000 सरकारी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों को बंद या अन्य स्कूलों में मर्ज** किया जा चुका है।

**नीति आयोग का समाधान: ‘पिरामिड’ नहीं, अब ‘सिलेंडर’ मॉडल की जरूरत**

इस संकट से उबरने के लिए नीति आयोग ने एक बड़ा नीतिगत सुझाव दिया है। वर्तमान में भारत का स्कूल सिस्टम ‘पिरामिड’ की तरह है, जहां 7.3 लाख प्राइमरी स्कूल हैं लेकिन 12वीं तक आते-आते सिर्फ 1.64 लाख हायर सेकेंडरी स्कूल ही बचते हैं। इस वजह से बच्चों को बार-बार स्कूल बदलना पड़ता है और वे पढ़ाई छोड़ देते हैं।

आयोग ने सिफारिश की है कि अब भारत को **”सिलेंड्रिकल स्कूलिंग मॉडल” (Composite Schools)** अपनाना चाहिए, जहाँ कक्षा 1 से लेकर कक्षा 12 तक की पढ़ाई एक ही छत के नीचे, एक ही बड़े कैंपस में हो। इसके साथ ही आयोग ने शिक्षा बजट को वर्तमान के 4.6% से बढ़ाकर जीडीपी के **6%** करने और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को कक्षा 3 से जिम्मेदारी और सही शिक्षक प्रशिक्षण के साथ जोड़ने का रोडमैप सुझाया है, ताकि देश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था को फिर से जीवनदान दिया जा सके।

 

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