“2002 के नदेसर शूट-आउट केस में हाई-कोर्ट ने पूर्व सांसद धनंजय सिंह की अपील ठुकराई — आरोपियों की बरी को बरकरार”
यह मामला 23 साल पुराना है। 4 अक्टूबर 2002 को वाराणसी के नदेसर इलाके में हुए शूटआउट में पूर्व सांसद धनंजय सिंह, उनके ड्राइवर व गनर घायल हुए थे। उस समय उन्होंने आरोपियों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कराया था।
आरोपियों पर था कि उन्होंने ए-47 जैसे हथियारों से उन पर जानलेवा हमला किया था।
ट्रायल कोर्ट ने जुलाई 2025 में साक्ष्य के अभाव में चार आरोपियों को बरी कर दिया था। इनसे जुड़ी सज़ा/सज़ा-मुद्दा सम्मेलन के आदेश (गैंगस्टर एक्ट के तहत) को चुनौती देते हुए धनंजय सिंह ने इलाहाबाद हाई-कोर्ट में याचिका दायर की थी।
लेकिन अदालत (सिंगल बेंच, जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला) ने उनकी आपत्ति को खारिज कर दिया — यह कहते हुए कि गैंगस्टर एक्ट के तहत अपराध “समाज/राज्य” के खिलाफ माना जाता है, न कि व्यक्तिगत अपराध। इसलिए “पीड़ित” व्यक्ति के रूप में निजी याचिका रखी गई अपील को पोषणीय नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने निर्णय दिया कि केवल राज्य को ही ऐसे सामाजिक–अपराधों पर कार्रवाई तथा अभियोजन शुरू करने का अधिकार है; व्यक्तिगत पीड़ित की अपील का हक नहीं है।
इस फैसले के साथ, 23 साल पुराने विवादित नदेसर शूट-आउट केस में आरोपियों की बरी अब अन्ततः कायम रहेगी — और पूर्व सांसद के लिए न्याय की उम्मीद फिलहाल बंद हुई है।
मामला फिर से सुर्खियों में इसलिए भी आया क्योंकि यह दिखाता है कि UP Gangsters and Anti‑Social Activities (Prevention) Act, 1986 जैसी कड़ी धाराओं के दायरे व इस्तेमाल में न्यायालय किस तरह सीमाएं तय करता है।
साथ ही, यह फैसले समाज व राज्य-कानून के दृष्टिकोण को रेखांकित करता है — जहाँ कई दशक पुराने गंभीर हिंसात्मक मामलों में अभियोजन व न्याय प्रक्रिया की चुनौतियाँ उजागर होती हैं।
> नया दिल्ली / प्रयागराज – 6 दिसंबर 2025 — इलाहाबाद हाई-कोर्ट ने बुधवार को 2002 के चर्चित नदेसर (वाराणसी) शूट-आउट मामले में पूर्व सांसद धनंजय सिंह की अपील खारिज कर दी। उस ज्ञात घटना में धनंजय सिंह की गाड़ी पर ए-47 जैसे हथियारों से गोलीबारी हुई थी, जिसमें वे और उनका ड्राइवर घायल हो गए थे।
ट्रायल कोर्ट ने इस साल अगस्त में आरोपियों को साक्ष्य की कमजोरी के आधार पर बरी कर दिया था। धनंजय सिंह ने हाई-कोर्ट में इस बरी के आदेश को चुनौती दी थी, लेकिन अदालत ने कहा कि गैंगस्टर एक्ट का उद्देश्य “व्यक्तिगत” अपराध नहीं बल्कि “सामाजिक/राज्य-विरोधी” अपराधों को निवारित करना है। ऐसे में व्यक्तिगत पीड़ित की अपील को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य-संस्था ही सामाजिक अपराधों के विरुद्ध कार्रवाई का अधिकार रखती है। इस फैसले के साथ, 23 साल पुराना विवादित शूट-आउट मामला फिलहाल यहीं ठहर गया है — और आरोपियों की बरी बरकरार रही।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला दिखाता है कि कानूनी प्रक्रिया में “गैंगस्टर एक्ट” जैसे मामलों के लिए दोष सिद्धि और अभियोजन की दिशा में चुनौतियाँ किन-किन स्तरों पर आती हैं।




