उत्तर प्रदेशउत्तराखंडगढ़वाल मण्डलदिल्ली एनसीआरदेश-विदेशदेहरादूनयूथरुड़कीशिक्षासामाजिकहरिद्वार

Mission Shakti के तहत बुंदेलखंड (झांसी) की दो महिलाओं की सफल उद्यम-कहानी — Shivani Bundela और Neelam Sarangi — एक अखबार के फ्रंट पेज या फीचर स्टोरी लायक खबर है। 

बुंदेलखंड की महिलाओं ने कबाड़ को कला और बेर को कारोबार में बदला — ‘Mission Shakti’ से राष्ट्रीय पहचान”

झाँसी की शिवानी बुंदेला ने अपनी स्टार्ट-अप के तहत स्थानीय बेर (Indian jujube) से जूस, जैम, चॉकलेट, टोफी और अब स्नैक्स बनाए — इन उत्पादों को ब्रांड नाम Abrosaa से बाजार में उतारा गया है।

शिवानी अब लगभग 250 किसानों से बेर खरीदती हैं — जिससे खेती को लाभ हुआ — और उनकी इकाई ने करीब 20 महिलाओं को रोजगार भी दिया है।

दूसरी ओर, नीलम सारंगी ने बेकार समझे जाने वाले कबाड़ (scrap/waste materials) को कारीगरी और हाथ-कला के माध्यम से नई ज़िंदगियाँ दीं; उन्होंने ऐसे सामानों से कलाकृतियाँ, सजावटी व उपयोगी वस्तुएँ बनाईं — उनका स्टार्ट-अप Bekaar Ke Aakar कहलाता है।

नीलम ने न सिर्फ क्रिएटिव अप-साइक्लिंग के ज़रिए पर्यावरण को बचाने का काम किया, बल्कि कई महिलाओं (विशेषकर ग्रामीण या आर्थिक रूप से कमजोर) को हुनर सिखा कर आत्मनिर्भर बनाया है।

इन दोनों महिलाओं की कोशिशों को राज्य सरकार और प्रशासन द्वारा मान्यता मिली है — उनकी पहल को प्रोत्साहन दिया गया है; साथ ही इनसे प्रेरणा लेकर अन्य महिलाओं और युवतियों को भी स्वरोजगार व नवाचार के अवसर मिलने की राह खुली है।

अखबार लेख के लिए सुझाव — रिपोर्टिंग स्टाइल

> “जब कबाड़ हुआ कारीगरी, और बेर बना बिज़नेस — झाँसी की महिला उद्यमियों की प्रेरणादायक कहानी”

झाँसी/बुंदेलखंड — उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री पहल ‘Mission Shakti’ ने बुंदेलखंड की महिलाओं को यह साबित करने का मौका दिया है कि जहाँ चाह हो, वहाँ राह बन जाती है। झाँसी की शिवानी बुंदेला ने लोक-फल बचे बेर को आधुनिक खाद्य उत्पादों में बदलकर Abrosaa नामक ब्रांड लॉन्च किया, वहीं नीलम सारंगी ने कबाड़ समझे जाने वाले सामान से Bekaar Ke Aakar के तहत कलाकृतियाँ बनाकर न सिर्फ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी दिखाई, बल्कि कई महिलाओं को स्वरोजगार का रास्ता दिखाया।

स कामयाबी ने दिखा दिया कि — न सिर्फ खेती-किसानी या पारंपरिक मजदूरी, बल्कि नवचिंतन, हुनर और आत्मनिर्भरता से भी विकास संभव है।

क्यों यह खबर मायने रखती है — बड़े परिप्रेक्ष्य मेंयह कहानी दिखाती है कि कैसे स्थानीय संसाधन — बेर, कबाड़ आदि — अगर नवीन सोच + संसाधन + समर्थन मिले, तो नए कारोबार और रोजगार बन सकते हैं।

इससे न सिर्फ महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ती है, बल्कि स्वरोजगार, आत्मनिर्भरता और आत्म-सम्मान की दिशा में कदम मिलते हैं।

यह एक उदाहरण है कि कैसे स्थानीय खेती, कृषक समुदाय, कारीगरी, पर्यावरण-चेतना और उद्योग को एक साथ जोड़कर सस्टेनेबल विकास संभव है — खासकर पिछड़ी या ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले इलाकों में।

साथ ही, यह दिखाता है कि सरकारी प्रोत्साहन — पॉलिसी + स्कीम + समर्थन कितने महत्वपूर्ण हैं, जब महिलाएं स्वयं आगे आयें और रचनात्मक पहल करें।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button