सचिन तिवारी
हरिद्वार
भारत की सामाजिक संरचना में एकता और अखंडता को सर्वोच्च मूल्य माना गया है, लेकिन हाल के वर्षों में आरक्षण नीति तथा उससे जुड़े कुछ कानूनों को लेकर देशभर में गंभीर बहस तेज हो गई है। आलोचकों का कहना है कि सामाजिक न्याय के उद्देश्य से बनाए गए ये कानून, यदि संतुलन और पारदर्शिता के साथ लागू न हों, तो वे समाज में विभाजन की भावना को बढ़ावा दे सकते हैं।
संविधान निर्माताओं ने ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की थी। यह उद्देश्य आज भी प्रासंगिक है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में जाति-आधारित आरक्षण से गुणवत्ता, प्रतिस्पर्धा और मेरिट पर असर पड़ रहा है। विशेषकर आईआईटी और आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश के लिए अलग-अलग कटऑफ अंकों को लेकर असंतोष की स्थिति बनती जा रही है।
इसी तरह, एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम को लेकर भी मतभेद सामने आ रहे हैं। जहां एक ओर इसे कमजोर वर्गों की सुरक्षा का अहम हथियार माना जाता है, वहीं दूसरी ओर इसके कथित दुरुपयोग को लेकर भी आवाज़ें उठ रही हैं। कुछ सामाजिक संगठनों का दावा है कि झूठे मामलों से न्याय प्रणाली पर दबाव बढ़ता है और समाज में भय व अविश्वास का माहौल बनता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2018 में इस कानून के कुछ प्रावधानों पर दिशा-निर्देश जारी किए गए थे, हालांकि बाद में संशोधन के जरिए कानून को फिर सख्त किया गया।
विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि अब समय आ गया है जब आरक्षण नीति की समीक्षा की जाए और इसे आर्थिक स्थिति, शिक्षा स्तर और वास्तविक पिछड़ेपन से जोड़ा जाए। उनका कहना है कि समान गुणवत्ता वाली शिक्षा, कौशल विकास और अवसरों की समान उपलब्धता ही सच्चे अर्थों में समावेशी भारत की नींव रख सकती है।
देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय हित के बीच संतुलन स्थापित किया जाए, ताकि “सबका साथ, सबका विकास” केवल नारा नहीं, बल्कि व्यवहारिक सच्चाई बन सके ।




