देश में जारी विशेष गहन मतदाता सूची संशोधन (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर चुनाव आयोग ने मंगलवार को बताया कि यह प्रक्रिया न्यायोचित, उचित और संतुलित है तथा इसे चुनौती देने वाली याचिकाओं को सर्वोच्च न्यायालय में खारिज किया जाना चाहिए। आयोग की ओर से वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने पीटीआई के अनुसार कहा कि SIR प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दलों और कुछ संगठनों द्वारा दायर याचिकाएँ आधारहीन हैं और अदालत में उन्हें आगे नहीं बढ़ाया जाना चाहिए।
निर्वाचन आयोग ने अपनी दलील में यह भी स्पष्ट किया कि जहाँ तक बिहार और अन्य राज्यों में SIR लागू है, वह प्रातिनिधिक लोगों को हटाने या जोड़ने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि वैध और पारदर्शी संशोधन का हिस्सा है, और इसमें शामिल लोगों के खिलाफ “फिशिंग या रॉविंग” जांच नहीं हो सकती। आयोग ने कहा कि जिन लगभग 66 लाख मतदाताओं के नाम बिहार में हटाए गए, उनमें से किसी ने न तो आयोग के पास अपील की और न ही उच्च न्यायालय में चुनौती पेश की है।
चुनाव आयोग ने दलील दी कि मतदाता सूची का यह विशेष संशोधन प्राकृतिक न्याय एवं प्रतिनिधित्व कानूनों के अनुरूप किया गया है और यह प्रक्रिया मतदाता पहचान को सुदृढ़ करने व सूची को अधिक सटीक बनाने के उद्देश्य से चल रही है।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान आयोग ने यह भी कहा कि नियमों के तहत उसे मतदाता सूची संशोधन का निर्णय लेने और लागू करने का अधिकार है, जो 1950 के प्रातिनिधिक अधिनियम (Representation of the People Act) की धारा 21(3) के अंतर्गत आता है।
ये दलीलें ऐसे समय में सामने आई हैं जब कई राज्यों में मतदाता सूची के विशेष संशोधन को लेकर आलोचनाएँ और याचिकाएँ दायर की गई हैं, और अदालत से कहा गया है कि यह प्रक्रिया संभवतः कुछ मतदाताओं के खिलाफ पक्षपातपूर्ण हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट इस पर अपना अंतिम निर्णय आने वाले वक़्त में देगा




