पश्चिम बंगाल में सहायक शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और रिश्वत लेने के आरोप सामने आए हैं, जिसमें लगभग 25,000 नियुक्ति पत्र रिश्वत के बदले जारी किए गए थे। इस घोटाले की जांच प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 के तहत की है।
ईडी के कोलकाता क्षेत्रीय कार्यालय ने जांच के दौरान मुख्य आरोपितों की संपत्तियों को जब्त किया है, जिनमें लगभग ₹698 करोड़ मूल्य की अचल संपत्तियां शामिल हैं। इन संपत्तियों का संबंध टीएमसी विधायक जीवन कृष्ण साहा, प्रसन्ना कुमार रॉय तथा उनके सहयोगियों से है, जिन्होंने कथित तौर पर अयोग्य उम्मीदवारों से नियुक्ति दिलाने के लिए भारी रिश्वत ली।
जांच में यह भी सामने आया कि भर्ती प्रक्रिया की निर्धारित समय सीमा के बाद भी नियुक्ति पत्र जारी किए गए, जबकि कई अभियुक्तों ने ओएमआर शीट, साक्षात्कार एवं पात्रता डेटा में गड़बड़ी कराई थी। ईडी ने आरोपियों के पास से करोड़ों रुपये की नकदी और अवैध संपत्तियों को जब्त कर लिया है।
इस मामले में सीबीआई द्वारा दर्ज एफआईआर के आधार पर प्रारंभिक जांच की शुरुआत हुई थी, और बाद में ईडी ने गहन मनी लॉन्ड्रिंग जांच शुरू की। जांच एजेंसियों के अनुसार, भ्रष्ट तरीके से प्राप्त धन को विभिन्न कंपनियों, LLP और बैंकों के खातों के माध्यम से “पोंज़ी-पैटर्न” के तहत सफेद किया गया।
घोटाले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पिछले वर्ष 3 अप्रैल 2025 को 25,000 से अधिक शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्तियों को “दूषित और दागदार” बताकर रद्द कर दिया था। शीर्ष अदालत के आदेश में कहा गया कि संपूर्ण चयन प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर हेराफेरी और निष्पक्षता का अभाव पाया गया है।
पश्चिम बंगाल में यह मामला राज्य-व्यापी सरकारी भर्ती व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही के मुद्दे को फिर से उजागर कर गया है, तथा सरकारी अधिकारियों और दलों की भूमिका पर सवाल खड़े कर रहा है। आगामी न्यायिक कार्यवाही में शामिल कई आरोपितों के खिलाफ़ मुकदमे जारी हैं।




