हरिद्वार। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पश्चिमी उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड क्षेत्र के क्षेत्र प्रचार प्रमुख पदम सिंह ने कहा कि संघ कार्य की शताब्दी यात्रा केवल इतिहास का स्मरण नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं की सुदृढ़ नींव है। वर्ष 1925 की विजयादशमी पर स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज अपने 100वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है और इस दौरान संघ का कार्य शाखाओं से आगे बढ़कर शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा, पर्यावरण, महिला सशक्तिकरण और डिजिटल साक्षरता जैसे विविध क्षेत्रों तक विस्तृत हुआ है।
उन्होंने कहा कि संघ ने सदैव ‘कथनी नहीं, करनी’ के सिद्धांत पर कार्य किया है। स्वयंसेवकों ने व्यवहार और सेवा के माध्यम से समाज में अपनी भूमिका को स्थापित किया है। वर्तमान समय में जब भारत वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है, तब समाज में समरसता, सेवा, विज्ञान और आध्यात्म के संतुलन की आवश्यकता है।
पदम सिंह ने बताया कि संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने समाज जागरण के लिए ‘पंच परिवर्तन’ का आह्वान किया है। इसके अंतर्गत सामाजिक समरसता, कुटुम्ब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्व-आधारित जीवन शैली और नागरिक कर्तव्य जैसे पांच प्रमुख बिंदुओं पर विशेष बल दिया गया है। उन्होंने कहा कि ये विषय नए नहीं हैं, बल्कि संघ की स्थापना काल से ही इनके मूल विचार समाज में रहे हैं।
उन्होंने कहा कि परिवार समाज की आधारभूत इकाई है, इसलिए कुटुम्ब व्यवस्था को सुदृढ़ करना आवश्यक है। जाति, वर्ग और क्षेत्र के भेदभाव से ऊपर उठकर सभी को एक परिवार के रूप में देखने की दृष्टि विकसित करनी होगी। साथ ही जल, जंगल और जमीन के संरक्षण के लिए प्रत्येक नागरिक को सजग रहना चाहिए। नागरिक कर्तव्य बोध के माध्यम से कानून का पालन और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना भी आवश्यक है।
संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले के कथन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि बौद्धिक आख्यान को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में स्थापित करना और सज्जन शक्ति को संगठित करना संघ के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ के विषय में यदि किसी के मन में जिज्ञासा या भ्रम हो तो वह शाखा में आकर स्वयं कार्य को देख सकता है। विभिन्न भाषाओं, वर्गों और पृष्ठभूमि के लोग बिना किसी प्रचार-प्रसार के राष्ट्रसेवा के भाव से कार्य कर रहे हैं।
अंत में उन्होंने कहा कि आज जब विश्व भारत की ओर आशा और विश्वास से देख रहा है, तब पंच परिवर्तन के माध्यम से समाज के प्रत्येक व्यक्ति को आत्मचिंतन और सकारात्मक आचरण अपनाते हुए राष्ट्र निर्माण में योगदान देना चाहिए।




