एक नए शोध में चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) हमेशा की जैव-विविधता और पारिस्थितिकी पर गहरा प्रभाव डाल रहा है और यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं। शोध में हिमपात, वर्षा पैटर्न और मानव गतिविधियों में बदलाव को मुख्य कारण बताया गया है, जिससे मध्यम हिमालय क्षेत्र में वनस्पति, जल स्रोत, वन्यजीव और औषधीय पौधे प्रभावित हो रहे हैं।
शोध गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय, श्रीनगर के पर्यावरण विशेषज्ञों द्वारा इंटरनेशनल जर्नल ऑफ बायोडायवर्सिटी साइंस, ईकोसिस्टम सर्विसेस एंड मैनेजमेंट में प्रकाशित किया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार हिमालयी क्षेत्रों में अब हिमपात में कमी, जल-धाराओं का मौसमी होना और अत्यधिक मानव हस्तक्षेप जैव-विविधता को कमजोर कर रहे हैं।
प्रमुख बिंदु
पिछले दशकों की अपेक्षा कम हिमपात हो रहा है, जिससे नदियाँ और धाराएँ पूरे वर्ष पानी नहीं दे पा रही हैं।
बारिश के स्वरूप में बदलाव के कारण अचानक भारी वर्षा और लंबे सूखे दौर देखने को मिल रहे हैं, जिससे भूस्खलन, मृदा अपरदन तथा फसल नुक़सान की घटनाएँ बढ़ीं हैं।
शोधकर्ता यह भी बता रहे हैं कि कुटकी, अतीस, जटामासी, सालम पंजा, चिरायता जैसे बहुमूल्य औषधीय पौधों की संख्या और पुनर्जनन क्षमता में गिरावट आई है, जो आजीविका और पारंपरिक दवाइयों के स्रोत को प्रभावित कर रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह समस्या सिर्फ़ जलवायु परिवर्तन की वजह से नहीं है, बल्कि असंतुलित विकास परियोजनाएँ, सड़क निर्माण, जलविद्युत परियोजनाएँ और अनियोजित पर्यटन भी जैव-विविधता को दबा रहे हैं। इसके कारण वन्यजीव अपने प्राकृतिक आवासों से बाहर आ रहे हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएँ बढ़ने लगी हैं।
शोध में सुझाव दिया गया है कि सामुदायिक भागीदारी, जल स्रोत संरक्षण, औषधीय पौधों का वैज्ञानिक प्रबंधन और दीर्घकालिक नीति अपनाना आवश्यक है, जिससे हिमालयी पारिस्थितिकी को स्थिर रखा जा सके और स्थानीय लोगों की आजीविका सुरक्षित रहे।




