यह चिप लगभग 300 माइक्रॉन लंबी और 70 माइक्रॉन चौड़ी है—एक इंसान के बाल की चौड़ाई जितनी।
मस्तिष्क में लगाए जाने पर यह न्यूरल संकेतों को पकड़कर इन्फ्रा-रेड लाइट के माध्यम से बाहरी रिसीवर तक भेजती है।
इसे Cornell University के इंजीनियर Elios Möller ने विकसित किया है, जिन्होंने कहा है कि यह “अब तक की सबसे छोटी डिवाइस है जो मस्तिष्क की गतिविधि माप सकती और वायरलेस तरीके से सँचार कर सकती है।”
इस चिप के प्रयोग चूहों में किए गए हैं — चूहों के मस्तिष्क के उस हिस्से में लगाया गया था जो उनके मूंछों से आने वाली जानकारी को प्रोसेस करता है। परीक्षण में चिप ने एक वर्ष से अधिक समय तक लगातार संकेत रिकॉर्ड किए और चूहे स्वस्थ रहे।
पारंपरिक ब्रेन चिप्स के विपरीत, MOTE में किसी तार की आवश्यकता नहीं है, जिससे संक्रमण व जलन का जोखिम कम होता है। साथ ही यह MRI जैसे परीक्षणों के लिए भी सुरक्षित सामग्री से बनी है।
भविष्य में, इस तकनीक का इस्तेमाल न केवल मस्तिष्क बल्कि रीढ़ की हड्डी, अन्य नाज़ुक ऊतकों तथा कृत्रिम खोपड़ी प्लेट्स में भी किया जा सकता है।
यह खोज न्यूरोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में मील का पत्थर मानी जा सकती है, क्योंकि यह न्यूरल इंटरफेस को पहले से छोटे, कम आक्रामक और वायरलेस स्वरूप में ला रही है। इससे गंभीर रूप से लकवाग्रस्त व्यक्ति मस्तिष्क-संचालित इंटरफेस से कम्प्यूटर, रोबोट या अन्य उपकरण नियंत्रित कर सकेंगे।
हालांकि अभी यह प्रयोग पशु मॉडल में सफल हुआ है और मानव परीक्षणों के लिए वक्त लगेगा, पर यह दिशा तकनीकी व चिकित्सकीय दोनों रूप से बेहद प्रगतिशील दिखती है।




